इश्क़ में हम तुम्हे क्या बताये  / Ishq Mein Hum / Akhlaq Sagari

इश्क़ में हम तुम्हे क्या बताये
किस क़दर चोट खाये हुए हैं
मौत ने उनको मारा है और हम
ज़िंदगी के सताये हुए हैं

ऐ लहद अपनी मिट्टी से कह दे,
दाग लगने न पाये क़फ़न को,
आज ही हमने बदले हैं कपड़े,
आज ही हम नहाये हुए हैं,

उसने शादी का जोडा पहन कर,
सिर्फ़ चूमा था मेरे बदन को,
बस उसी दिन से जन्नत की हूरे,
मुझको दूल्हा बनाये हुए हैं,

अब हमें तो फ़कत एक ऐसी,
चलती फ़िरती हुई लाश कहिये,
जिन की मैयत में हद है के हम ख़ुद,
अपना कंधा लगाये हुए हैं,

देख साक़ी तेरे मयकदे का,
कितना पहुँचा हुआ रिन्द हुं मैं,
जितने आये हैं मैयत में मेरी,
सब के सब ही लगाये हुए हैं,

एक आंसू न पलकों से टपके,
यह वफ़ा का तक़ाज़ा है वरना,
दोस्तों हम भी आँखों में अपनी,
गंगा जमना छुपाये हुए हैं,

दुश्मनो की शिकायत है बाकी,
दोस्तों से गिला क्या करेंगे,
झड़ चुके जिन दररख्तों के पत्ते,
फिर कहाँ उनके साये हुए हैं,

उनकी तारीफ  क्या पूछते हो,
उम्र साड़ी गुनाहो में गुजरी,
पारसा बन रहे हैं वह ऐसे,
जैसे गंगा नहाये हुए हैं,

खोई खोई सी बेचैन आँखें,
बेकरारी हैं चेहरे से ज़ाहिर,
होना हो अप्प भी मेरी तरह,
इश्क़ की चोट खाये हुए हैं,

किआ हैं अंजाम उल्फत का तन्वा,
जा के शम्मा के नज़दीक देखो,
कुछ पतंगों की लाशें पररि हैं,
पर किसी के जलाये हुए हैं,

ग़म तो यह है की जिन शायरों की,
बात भी ज़िन्दगी भर न पूछी,
बाद मरने के ‘अख़लाक़’,
उनको लोग सर पे उठाये हुए हैं !

अख़लाक़ सागरी

ट्रांसलेशन : हरमीत सिधु

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