Jab Nazar Se Milayi Maza Aa Gaya / Fana Buland Shehri

This Urdu ghazal was penned by the Pakistani poet Fana Buland Shehri and performed as a qawwali by the great Ustad Nusrat Fateh Ali Khan (1948-1997). I could not find much online about the poet’s life, but quite a few famous qawwalis are attributed to him.

मेरे रश्क-इ-कमर तू ने पहली, नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया,
बर्क सी गिर गई काम ही कर गई, आग ऐसी लगाईं मज़ा आ गया,

जाम में घोल कर हुस्न की मस्तियाँ, चांदनी मुस्कुराई मज़ा आ गया,
चाँद के साए में ऐ मेरे साक़िया, तू ने ऐसी पिलाई मज़ा आ गया,

नशा शीशे में अंगराई लेने लगा, बज़्म -इ-रिंदाँ में सागर खनकने लगे,
मयकदे पे बरसने लगीं मस्तियाँ, जब घटा घिर के छाई मज़ा आ गया,

बेहिजाबाना वोह सामने आ गए, और जवानी जवानी से टकरा गई,
आँख उन की लारी यूं मेरी आँख से, देख कर यह लड़ाई मज़ा आ गया,

आँख में थी हया हर मुलाक़ात पर, सुर्ख आरिज़ हुए वस्ल की बात पर,
उस ने शर्मा के मेरे सवालात पे, ऐसे गर्दन झुकाई मज़ा आ गया,

शेख साहिब का ईमान मिट ही गया, देख कर हुस्न-इ-साक़ी पिघल ही गया,
आज से पहले ये कितने मग़रूर थे, लूट गई पारसाई मज़ा आ गया,

ऐ फ़ना शुक्र है आज बाद–इ-फ़ना, उस ने रखली मेरे प्यार की आबरू,
अपने हाथों से उस ने मेरी क़बर पर, चादर-इ-गुल चढ़ाई मज़ा आ गया !

फ़ना बुलंद शहरी

हिंदी में अनुवाद: हरमीत सिधु

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