मैं देशद्रोही हूँ

हां
मैं देशद्रोही हूँ

मुझे देश के
चुनिंदा प्रधानमंत्री की
56 इंच चौड़ी छाती में
हिटलर की छवि नज़र आती है
और
अढ़ाई सेर के सर के भीतर
कचरा।

वही कचरा
जो छोड़ गए थे अंग्रेज़
हिन्दुस्तान की रग-रग में
धर्म और जाति के
रूप में।

हां
मैं देशद्रोही हूँ
मुझे गोमूत्र
और कुत्ते के मूत में
सिर्फ यही फर्क नज़र आता है
कि गाय
टांग उठा के नहीं मूतती।

मुझे इस विवस्था में
खोट नज़र आता है
जहां इन्साफ़ का तकाजा
खुदकुशी कर लेता है
भावनाओं के आहत होने से
और
पहन लेता है
भेड़िये की खाल
चलने लगता है
कछुए की चाल।

हां
मैं देशद्रोही हूँ
मुझे कपटी राम के आगे
श्री लगाने
और विद्वान रावण को
पापी कहने में
दिक्कत होती है

औरत को तमाशा बना
कभी अगिनपरीक्षा
कभी चीरहरण
कभी तपस्या भंगिनी
कभी देवदासी
और कभी साड़ी की जगह
आधुनिक लिबास पहनने पर
योग गुरूओं द्वारा
कसी जाती फब्तीयां
मुझे प्रेशान करती हैं।

पनघट से अंगियां
और लड़कीयों के
अंत्र वस्त्र चुरा
उनके सौंद्रय की
स्कैनिंग कर
रासलीला रचाने वाला अय्याश
मुझे किसी भी ऐंगल से
भगवान नज़र नहीं आता
इसलिए
मैं देशद्रोही हूँ
मुझ पे
देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाए।

मैं नफ़रत करता हूँ
उस कानून से
जो कुत्तों के अधिकारों की
रक्षा करता है
और छोड़ देता है मनुष्य को
कुत्तों के रहम पर

जो खामोश है
फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर
किसी अमीरज़ादे द्वारा
गाड़ी चढ़ा देने पर
और बेहाल है
किसी ग़रीब के चूल्हे पर
गोमास पकने पर।

मुझे नफ़रत है
उन लोगों से
जिन्हें गाय माता नज़र आती है
और सांढ को बाप कहने में
शर्म आती है

जो गोशाला में
संगमरमर लगाने के लिए
तत्पर हैं
और इसके लिए
कुछ भी कर सकते हैं
इंसानियत का खून भी बहा सकते हैं
और
बेघरों को
घर बना के देने की मांग पर
निकाल लेते हैं
त्रिशूल, तलवारें।

मुझे मालूम है
मर्दानगी का डंका पीटने वाले
नामर्द हुआ करते हैं
और मुझे
कोई खतरा नहीं
इन नामर्दों सें।

मैं अंधे को
अंधा कहने का
गुनाह कबूल करता हूँ
और अपनी आंखें
खोल के रखता हूँ
अपना सर उठा के चलता हूँ।

मुझे मालूम है
इस गटर में से
क्या निकलेगा
भारत माता की जय के
खोखले नारों के सिवाय
फटे हुए निरोध निकलेंगे

जिसकी पैदायश है
हमारा गला सड़ा सिस्टम ।

हां मैं देशद्रोही हूँ
मुझ पर
देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाए
और मुझे भी
अपने देश को
अपने लोगों को
अपनी आज़ादी को
प्रेम करने का
सबक सिखाया जाए।
‪#‎ਗੱਗਬਾਣੀ‬

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Asi Haramzaade Nai / Surjit Gag

asi_haramzaade_nai

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Punjabi / Multiple / Two Liners

Kinne hi rang-dhang handha chuki hai zindagi,
Par jisnu rahe udeekde oh mausam taan aaya hi nahin! … Bubbu Tir


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Hindi / Multiple / Two Liners

Jo Guzer Rehi Hai Guzar Lo,
Na Bura Kaho Na Gila Karo,
Jo Tumhara Haal Hai Dosto,
Wohi Sare Sheher Ka Haal Hai… Unknown


Phir baithe baithe vaada e vasl us ne kar liya,
Phir uth khada huya wahi rog intezaar ka… Unknown


le mere tajurbo.n se sabak ae mere raqiib
do chaar saal umr me.n tujhase ba.Daa huu.N mai.n – Qateel


aangadaaii par angadaaii letii hai raat judaaii kii
tum kyaa samajho tum kyaa jaano baat merii tanahaaii kii


Tumhe bhi yaad nahi aur main bhi bhool gaya,
Wo lamh kitna hasin tha magar fuzool gaya


Dekha jab tumhe to mujhe sochna pada,
socha jabb tumhe to mujhe sochna pada.


iss se pehle ke haarta tujh se,
mere haalaat mujh se jeet gaye.


ik mulaqaat thi jo dil ko sada yaad rahi,
hum jise umar samjhate the woh ik pal nikla… (Ayub Rumani)


Jab se usne shehar ko chooda har rasta sun saan hua,
apna kya hai saare shehar ka ikk jaisa niksaan hua


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Hindi / Multiple / Two Liners

shab-e-intazaar ki kash-ma-kash na puuchh kaise sahar hu_ii
kabhi ik chiraaG bujha diyaa kabhi ik chiraaG jala liyaa – Majrooh Sultanpuri


sunaa hai u.nhe.n bhii havaa lag ga_ii,
havaao.n ke jo ruKh badalate rahe… Bashir Badr


vo Khudaa hai kisii Tuute hue dil mein hogaa..
masjidon mein use Dhuundho na kaliisaaon mein  – Qateel

[kaliisaa = church]


bhhol jana bhi to ikk tarah ki nehmat hai faraz,
warna insaan to pagal na bana de yaadein… Ahmed Faraz


Abke Faraz wo huya jiska na tha gumaan tak,
Pahle si dosti to kya khatam hai bol chaal bhi… Ahmed Faraz


kis-kisakaa naam lauu.N zabaa.N par ki tere saath
har roz ek shaKhs nayaa dekhataa huu.N mai.n – Qateel


kasam khuda ki khuda bhi saaf kehta hai
mera jawab tu hai…tera jawab nahi… Unknown


Kia Karain Ye Dil Kisi Ki Na-Sihaa Sunta Hee Nahi
Aap Ne Jo Kuch Kahaa Ay Mohatram, Apni Jaga… Ahmed Faraz


kal jo thaa vo aaj nahii.n jo aaj hai kal miT jaayegaa…
ruukhii-suukhii jo mil jaaye shukr karo to behatar hai – Nasir


Tum giraane me’n lage tthe tumne socha hee nahi,
Mai gira to maslaa ban_kar khada ho jaaunga –  Wasim Barelvi


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Tur Giya / Dr. Jagtar

ਕੌਣ ਹੋਣੀ ਪੰਛੀਆਂ ਦੀ ਜਾਲ ਲਿਖ ਕੇ ਤੁਰ ਗਿਆ।
ਕੌਣ ਮਹਿਕਾਂ ਦਾ ਮੁਕੱਦਰ ਭਾਲ ਲਿਖ ਕੇ ਤੁਰ ਗਿਆ।

ਵਾਕ ਬਿਸਮਿਲ, ਅਰਥ ਘਾਇਲ, ਨੈਣ ਬੋਝਲ, ਮਨ ਉਦਾਸ,
ਤੂੰ ਤਾਂ ਕੋਰਾ ਬਣ ਕੇ ਅਪਣਾ ਹਾਲ ਲਿਖ ਕੇ ਤੁਰ ਗਿਆ।

ਜੇ ਨਾ ਰੋਵਾਂ ਬਹਿਣ ਨਾ ਦੇਵੇ, ਜੇ ਰੋਵਾਂ ਵਹਿ ਤੁਰੇ,
ਤੂੰ ਕੀ ਨੈਣਾਂ ਵਿਚ ਨਜ਼ਰ ਦੇ ਨਾਲ ਲਿਖ ਕੇ ਤੁਰ ਗਿਆ।

ਸ਼ਾਮ, ਖੰਡਹਰ, ਖ਼ੁਸ਼ਕ ਦਰਿਆ, ਰੁਲ਼ ਰਹੇ ਪੱਤੇ ਚਰਾਗ਼,
ਕੌਣ ਪ੍ਰਕਿਰਤੀ ਨੂੰ ਮੇਰਾ ਹਾਲ ਲਿਖ ਕੇ ਤੁਰ ਗਿਆ।

ਜਦ ਕਦੇ ਫੁਰਸਤ ਮਿਲ਼ੇ ਤਾਂ ਯਾਦ ਕਰ ਲੈਣਾ ਤੁਸੀਂ,
ਘਰ ਦੇ ਮੱਥੇ ਇਹ ਲਹੂ ਦੇ ਨਾਲ ਲਿਖ ਕੇ ਤੁਰ ਗਿਆ।

Dr. Jagtar.

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Kampann / Dr. Patar

ਹੈ ਮੇਰੇ ਸੀਨੇ ‘ਚ ਕੰਪਨ ਮੈਂ ਇਮਤਿਹਾਨ ‘ਚ ਹਾਂ
ਮੈਂ ਖਿੱਚਿਆ ਤੀਰ ਹਾਂ ਐਪਰ ਅਜੇ ਕਮਾਨ ‘ਚ ਹਾਂ

ਹਾਂ ਤੇਗ ਇਸ਼ਕ ਦੀ ਪਰ ਆਪਣੇ ਹੀ ਸੀਨੇ ਵਿਚ
ਕਦੇ ਮੈਂ ਖੌਫ ਕਦੇ ਰਹਿਮ ਦੀ ਮਿਆਨ ‘ਚ ਹਾਂ

ਬਚਾਈਂ ਅੱਜ ਤੂੰ ਕਿਸੇ ਸੀਨੇ ਲੱਗਣੋਂ ਮੈਨੂੰ
ਕਿ ਅੱਜ ਮੈਂ ਪੰਛੀ ਨਹੀਂ, ਤੀਰ ਹਾਂ, ਉਡਾਨ ‘ਚ ਹਾਂ

ਜ਼ਮੀਨ ਰਥ ਹੈ ਮੇਰਾ, ਬਿਰਖ ਨੇ ਮੇਰੇ ਪਰਚਮ
ਤੇ ਮੇਰਾ ਮੁਕਟ ਹੈ ਸੂਰਜ, ਮੈਂ ਬਹੁਤ ਸ਼ਾਨ ‘ਚ ਹਾਂ

ਰਲੀ ਅਗਨ ‘ਚ ਅਗਨ, ਜਲ ‘ਚ ਜਲ, ਹਵਾ ‘ਚ ਹਵਾ,
ਕਿ ਵਿਛੜੇ ਸਾਰੇ ਮਿਲੇ, ਮੈਂ ਅਜੇ ਉਡਾਨ ‘ਚ ਹਾਂ

ਤੇਰਾ ਖਿਆਲ ਮੇਰੇ ਸੀਨੇ ਨਾਲ ਲੱਗਿਆ ਹੈ
ਹੈ ਰਾਤ ਹਿਜ਼ਰ ਦੀ ਪਰ ਮੈਂ ਅਮਨ ਅਮਾਨ ‘ਚ ਹਾਂ

ਮੈਂ ਕਿਸ ਦੇ ਨਾਲ ਕਰਾਂ ਗੁਫਤਗੂ ਕਿ ਕੋਈ ਨਹੀਂ
ਮੇਰੇ ਬਗੈਰ, ਮੇਰੇ ਰੱਬ, ਮੈਂ ਜਿਸ ਜਹਾਨ ‘ਚ ਹਾਂ

ਛੁਪਾ ਕੇ ਰੱਖਦਾ ਹਾਂ ਤੈਥੋਂ ਮੈਂ ਤਾਜ਼ੀਆਂ ਨਜ਼ਮਾਂ
ਮਤਾਂ ਤੂੰ ਜਾਣ ਕੇ ਰੋਵੇਂ ਮੈਂ ਕਿਸ ਜਹਾਨ ‘ਚ ਹਾਂ

ਇਹ ਲਫਜ਼ ਮੇਰੇ ਨਹੀਂ ਪਰ ਇਹ ਵਾਕ ਮੇਰਾ ਹੈ
ਜਾਂ ਖਬਰੇ ਇਹ ਵੀ ਨਹੀ ਐਵੇਂ ਮੈਂ ਗੁਮਾਨ ‘ਚ ਹਾਂ………

ਵਿਚੋਂ :- ਲਫਜ਼ਾਂ ਦੀ ਦਰਗਾਹ
ਸੁਰਜੀਤ ਪਾਤਰ

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